लॉजिकल रीजनिंग के प्रश्नों में अक्सर पारिवारिक रिश्तों पर आधारित सवाल पूछे जाते हैं, जैसे— राम, श्याम का भाई है; महेश, राम का पिता है; जगत, प्रिया का भाई है और प्रिया, श्याम की पुत्री है। बताइए, जगत का चाचा कौन है? मुझे नहीं पता कि किसी ने कभी इस बात पर विचार किया है या नहीं कि ऐसे प्रश्न पूछने की आवश्यकता आखिर पड़ी ही क्यों?
हम थोड़ा इतिहास में जाते है बात है सन 1969 की जब भारत सरकार द्वारा “हम दो, हमारे दो” का नारा और परिवार नियोजन अभियान मुख्य रूप से 1969-1972 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था। यह दुनिया के सबसे पुराने परिवार नियोजन कार्यक्रमों में से एक है, जिसकी व्यापक शुरुआत 1952 में ही कर दी गई थी। खैर यह कार्यकर्म जनसंख्या रोकने में कितना सफल रहा उसका प्रमाण तो हाल की भारत की जनसंख्या की दृष्टि से जो स्तिथि है उससे मिल ही जाता है |
हम अपने विषय पर आते है कि जो परिवार हमारे जीवन का आधार था उसकी संरचना हमारे लिए एक प्रश्न बन कर रह गयी है | मै या उन सभी को खुशकिस्मत मानता हूँ जिसने एक संयुक्त परिवार में रहने का सुख भोगा है |
हमारी दादी, माँ, बड़ी माँ, चाची, बुआ सब एक ही रसोई में एक जुट हो कर काम करती थी| वो गर्मीयों में एक साथ आचार बनाना, वो ठण्ड में दोपहर में धुप में बैठ कर एक ही बन्दर पंक्ति में एक-दुसरे की जुएँ निकालते हुए गप्पे लड़ाना | शाम में बिजली चली जाने पर एक ही आँगन में सारे बच्चो का उधम पछाड़ करना | परिवार में एक दुसरे पर अपना हक समझ कर बातें करना | रात में सारे खाना एक साथ खा कर एक ही टी. वी. पर एक ही धारावाहिक देखना | सबके नजर में सारे बच्चे उनके ही थे गलती करने पर अगर कोई डांट भी देता तो कोई ये नहीं सोचता था कि मेरे बच्चे को कैसे डांट दिया | किसी की भी तथाकथित (so-called) निजता भंग होने या अहं (Ego) को ठेस पहुँचने जैसी बातें नहीं होती थीं। छोटी-छोटी बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था, जिससे विवाद आगे नहीं बढ़ते थे। यदि किसी बड़े ने कुछ कह दिया, तो चुपचाप सामने खड़े होकर उसकी बात सुन ली जाती थी; कभी पलटकर जवाब देने की परंपरा नहीं थी। यही उस समय के संस्कार और जीवन-मूल्य हुआ करते थे।
संयुक्त परिवार की नींव दादाजी और दादी माँ जैसे परिवार के मुखिया हुआ करते थे। वे ही परिवार को सहेजकर रखते थे और उनका जीवन-मंत्र था—‘एक रहोगे, नेक रहोगे।’ इसी सोच ने परिवारों को जोड़े रखा और रिश्तों को मजबूत बनाया। परिवार में कोई भी आपदा आये तो यही सिद्धांत काम करता था न केवल संकट लेकिन सुख में तो और भी आनंद रखता था सब एक साथ सारे त्यौहार मानते होली हो या दीपावली | हमारे देश के राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का मानना था कि “एक मजबूत और खुशहाल परिवार ही महान राष्ट्र की नींव होता है।” वे संयुक्त परिवार व्यवस्था को विकास, प्रेम और एकता का प्रतीक मानते थे। उनके अनुसार, बच्चों को सही नैतिक मूल्य और संस्कार परिवार से ही मिलते हैं। स्थायी और नैतिक राष्ट्र का निर्माण सुखी परिवारों के आदर्श मूल्यों से ही संभव है।
एक सफल संयुक्त परिवार हमेशा उस पंक्ति को सदैव गलत सिद्ध कर देता है, “सुख के सब साथी दुःख में ना कोई” क्योकि सब साथ खड़े है | कई लोग उदहारण देते हुए कहते है – परिवार बड़ा था तो महाभारत हो गयी | लेकिन उनको यह समझना होगा, हमारे महाकाव्य गलतियों से सीख की कथा है | क्या नहीं करना है वह उसमे साफ़ पता चलता है | वैसे ही रामायण में एक पुत्र अपने पिता के वचन के लिये चुपचाप वनवास पर चला जाता है और उनकी पत्नी बिना किसी द्वेष के अपना पत्नी धर्म निभाते हुए अपने पति के साथ चली जाती है | इतने सुन्दर संस्कार एक अच्छे परिवार से ही प्राप्त होते है | हमें परिवार के बड़े ही सिखाते है सही आदर्शो पर चलना, कैसे बड़ो के पैर छूना, कैसे उनका आदर करना, कैसे समाज में व्यवहार करना ताकि समाज में हम अच्छे नागरिक के रूप में जाने जाए |
लेकिन धीरे-धीरे बदलाव आता गया | लोगो की जरूरते संयुक्त परिवार पर हावी होते गयी | एक समय था जब कुछ न हो कर भी सब कुछ था आज इतना कुछ हो कर भी पूरा नहीं पड़ता है | आज आप किसी के घर जाओ तो सोचना पड़ता है पता नहीं कैसा लगेगा, खाना खाना चाहिए या नहीं लोग घडी देखने लग जाते है | जब की अब तो छोटा परिवार है जिसके लिए कहा जाता है – छोटा परिवार सुखी परिवार फिर क्यों है समस्या ? मेरे कई मित्र ऐसे है जो कही बाहर निकलने से पहले सोचते है कि घर छोड़ के आखिर जाए कैसे | आज किसी की पत्नी गर्भवती है तो घर पर कोई बुजुर्ग नहीं सँभालने को | लोगो को जहाँ अपनी पीढियां मुहँ जबानी होती थी आज पिछली पीढ़ी के नाम भूलने लगे है, क्या गोत्र क्या वंश कोई बताने वाला ही नहीं | जिंदगी में सब भागने में लगे हुए है सबको कुछ ना कुछ बेहतर पाना है और पाना भी चाहिए | लेकिन आप जब कुछ बेहतर प्राप्त कर लोगे तो उसकी ख़ुशी बांटने वाला भी तो चाहिए होगा वो होगा आपका परिवार |
मुझे यह तो नहीं पता कि मेरे लेख का कितने लोग सहमत होंगे लेकिन यह तो सब मानते है जब इस देश को आज़ादी चाहिए थी तब सब एक जुट होना पड़ा था | यदि भारत को सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाना है, तो संयुक्त परिवार की भावना को पुनर्जीवित करना होगा। जब देश संयुक्त परिवार के सूत्र में बंधेगा, तभी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श साकार होगा।
एक अच्छे परिवार को संजोने के लिए सबको- मै ही क्यों करूँ से , मै ही करूँगा तक आना होगा फिर सब सही होगा |
